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वर्ष का हिंदी शब्द 2018

ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरीज़ का वर्ष का हिंदी शब्द 2018 है...

 

ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरीज़ का इस वर्ष का हिंदी शब्द, एक ऐसा शब्द या अभिव्यक्ति है, जो बीते हुए वर्ष की प्रकृति, मिजाज़, माहौल और मानसिकता को व्यक्त कर सकता है और इसे उसके स्थायी सांस्कृतिक महत्त्व के कारण चुना गया है.

जब हमने नवम्बर 2018 में, हिंदी बोलनेवालों से 'वर्ष के हिंदी शब्द' के बारे में सुझाव मांगे, तो उसकी जबर्दस्त प्रतिक्रया हुई और फिर हमने इस शब्द के चुनाव के लिए, हिंदी भाषा के विशेषज्ञों के अपने परामर्शी मंडल के साथ, जनता द्वारा भेजी गयी सैकड़ों प्रविष्टियों की छानबीन और समीक्षा की.

...और ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरीज का वर्ष 2018 का चयनित हिंदी शब्द है...नारी-शक्ति.

विभिन्न क्षेत्रों में नारी की बढ़ती सक्रियता ही नारी शक्ति है. यह शब्द संस्कृत से जन्मा है. नारी का अर्थ है 'महिला' और 'शक्ति' उसकी असीम ऊर्जा को व्यक्त करता है. शाक्त सम्प्रदाय की प्रमुख देवी 'शक्ति' ही हैं. उनकी तुलना परम ब्रह्म से की जाती है. 'मार्कंडेय-पुराण' के अनुसार आदि-शक्ति ही इस सृष्टि में समस्त प्रकार के तेज, ज्योति, प्रभा, चेतना और जीवन का कारण हैं. 'श्रीमद्भागवत' के अनुसार आदि-शक्ति ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश का रूप धारण करके संसार का पालन करती हैं. वह ही सारी सृष्टि को उत्पन्न तथा नाश करनेवाली परम-शक्ति हैं. आज यह शब्द, नारी-शक्ति, खुद अपने जीवन की नियंता, आधुनिक नारी की असीम क्षमताओं और संभावनाओं को व्यक्त करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.

ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरीज़ की लैंग्वेज चैम्पियन, कृतिका अग्रवाल ने कहा है, ' नारी शक्ति एक नारी की अंदरूनी शक्ति का प्रतीक है। ये शब्द हम सब के लिए युद्ध के आह्वान के समान हैं, जो हमें याद दिलाता है कि अपने सच और अपने हक़ के लिए हमको ख़ुद लड़ना है और हमारे पास इस लड़ाई को जारी रखने की शक्ति है। ये शब्द उस साहस का प्रतीक है जिसको लेकर हम आगे बढ़ रहे हैं। ये शब्द नहीं ये एक आंदोलन है, जिसमें पुरुष और नारी बराबर के भागीदार हैं।'

भारत सरकार के ठोस प्रयासों का आभार कि नारी-शक्ति पर सबका ध्यान 2018 में गया और देश भर के हिंदी बोलनेवालों ने समावेशी विकास के लक्ष्यों को महसूस किया. इस नयी पहल के साथ ही भारतीय समाज के सभी वर्गों ने महिलाओं के अधिकारों तथा सशक्तिकरण हेतु मौजूदा कानूनों के संशोधन के साथ ही विश्व्यापी #MeToo आन्दोलन का असर भी महसूस किया.

मार्च 2018 के आरम्भ में भारत सरकार द्वारा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर आरम्भ 'नारी-शक्ति पुरस्कार' के साथ ही 'नारी-शक्ति' शब्द अचानक ही व्यापक चर्चाओं का केंद्र बन गया. यह पुरस्कार लीक से हट कर, खासतौर से कमज़ोर और उपेक्षित महिलाओं के सशक्तिकरण पर ध्यान देनेवाली और समाज को नए मार्ग दिखानेवाली तथा महिलाओं की असाधारण उपलब्धियों और योगदान को महत्व देता है. 2018 में सम्मानित विभिन्न क्षेत्रों की 39 महिलाओं में एक थीं, जयम्मा भंडारी, जिनके पिछले 20 वर्षों में सेक्स-वर्करों की मदद तथा पुनर्वास के प्रयासों के कारण उन्हें राष्ट्रीय सम्मान दिया गया.

इन पुरस्कारों ने अवशेष वर्ष में महिला सशक्तिकरण, 'नारी-शक्ति' के पक्ष में ज़ोरदार माहौल ही बना दिया. 2018 में शुरु, वैश्विक स्तर पर कार्यस्थल पर समानता और गरिमा के लिए महिलाओं के संघर्ष का प्रतीक बन गया, #MeToo के आन्दोलन का भारत में विस्तार इसी चेतना का ज्वलंत उदाहरण है. भारतीय महिलाओं ने बहुत उग्रता के साथ, अपने-अपने कार्यस्थलों पर दशकों से होते आ रहे, यौन शोषण के मामलों का पर्दाफ़ाश करने में, सोशल मीडिया में #MeToo आन्दोलन का इस्तेमाल किया.

खोजबीन करने पर हमें पता चला कि सर्वोच्च न्यायालय के दो प्रमुख फैसलों ने भी 2018 में नारी-शक्ति के महत्व को उजागर करने की भूमिका निभाई, क्योंकि राजनीतिक क्षेत्रों के विभिन्न समीक्षकों ने इन फैसलों तथा उनके प्रभाव पर बहस शुरू कर दी थी. न्यायपालिका ने भी भेदभाव और शोषण से महिलाओं के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए कार्रवाई शुरू कर दी. सितम्बर 2018 में, सर्वोच्च न्यायालय ने, 'तुरंत तलाक' की विवादस्पद इस्लामिक प्रथा, तीन-तलाक पर यह कहते हुए प्रतिबन्ध लगा दिया कि यह व्यवस्था अब असंवैधानिक और तीन वर्ष के कारावास की सज़ा तक दंडनीय है. अगले ही महीने न्यायाधीशों ने केरल के विख्यात सबरीमाला मंदिर में महिलाओं और कन्याओं के प्रवेश पर प्रतिबन्ध के नियम को यह कहते हुए अवैध घोषित कर दिया कि मंदिर से महिलाओं और कन्याओं को दूर रखने की इस प्रथा, महिलाओं को प्राप्त उपासना करने तथा हिन्दू धर्म के मन्दिर में प्रवेश करने के नागरिक अधिकारों का उल्लंघन है.

2018 में ही महिलाओं के बिना महरम या पुरुष सहयात्री के हज-यात्रा पर जाने तथा सशस्त्र सेनाओं में खतरनाक-अभियानों में महिला सैनिकों की सहभागिता पर लगी रोक को हटाने जैसे महत्वपूर्ण निर्णय भी लिए गए. इसके साथ ही सरकार द्वारा प्रायोजित अत्यंत सफल कार्यक्रम 'बेटी बचाओ, बेटी पढाओ' (सेव द गर्ल चाइल्ड, एजुकेट गर्ल चाइल्ड) को, 2018 में ही देश के सभी जिलों में लागू किया गया. इस कार्यक्रम में लाभार्थियों को बैकों में खाते खोलने तथा विभिन्न ऋणों के लिए आवेदन करने की सुविधा देने का भी अभूतपूर्व फैसला लिया गया.

नारी शक्ति के अंतर्गत 2018 में नारी-सुरक्षा को भी सर्वोच्च प्राथमिकता मिली. इसी साल 200 स्थानों पर, किसी भी प्रकार की हिंसा-शोषण या समस्या का शिकार महिलाओं को एकल-खिड़की सुविधा के अंतर्गत, मदद सुनिश्चित कराने की व्यवस्था भी की गयी. सप्ताह के सातों दिन चौबीसों घंटे महिलाओं की सहायता के लिए 28 राज्यों में सार्वभौमिक 181 हेल्प-लाइन नम्बर की सुविधा का भी इंतजाम हुआ. अनेक राज्य सरकारों ने भी इसी साल महिलाओं को साइबर अपराधों, ऑनलाइन शोषण-उत्पीडन, हिंसा और शिकायतों से बचने के लिए सक्रिय बंदोबस्त भी इसी साल शुरू किए.

बेशक 2018 में नारी-शक्ति का बोलबाला रहा. चाहे सरकार की पहल से, या विभिन्न महिला संगठनों द्वारा किए गए प्रयासों के कारण अथवा न्यायपालिका की सक्रियता की वजह से, मगर कोई महीना ऐसा नहीं गया जब, नारी-शक्ति ने अपना दम ख़म ना दिखाया हो. इसी साल में महिलाओं के अधिकारों और उनकी सुरक्षा को लेकर समाज में चेतना बढ़ी और लोगों को महसूस हो गया कि नारी-शक्ति महज एक शब्द नहीं रह गया है. ये बदलते समाज और इंसानियत के भविष्य का आइना है. आज की नारी परंपरागत मजबूर, बेबस और अशक्त नारी नहीं रही. वह हालातों से जूझ कर उनको बदल सकती है. इसी लिए आज का कवि भी उसकी सराहना करते हुए कहता है:-

नारी शक्ति वाह, तुम्हारी अतुल कहानी

हर बाधा को कुचला, जब मंज़िल की ठानी

(अंकुश)

... और आज की निरंतर सशक्त होती नारी के सम्मान में ही इस शब्द को ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरीज़ का वर्ष का हिंदी शब्द 2018 चुना गया.

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